दिल और दिमाग के द्वंद

एक छोटा प्रयास :-
दिल और दिमाग के द्वंद पर लघु कथा

एक बार दिल और दिमाग में ठन गई कि कौन श्रेष्ठ है l

दिमाग (मुस्कुराकर) – “पता है दिल इन्सान को सदा मेरी सुननी चाहिए l तभी तो ख़ुद ईश्वर ने भी इंसान के शरीर में मुझे तुमसे ऊँचा स्थान दिया है l”

दिल (थोड़ा हँस कर) – “हाँ, लेकिन सर्वोपरी भावना प्रेम तो मुझमे ही पनपता और विकसित होता है l उसकी पहचान मुझसे है l”

दिमाग (गर्व से) – “हाँ और उसी प्रेम में जब भी तुम्हें दुख होता है, मैं ही तुम्हें समझाता और संभालता हूँ l तुम तो बार – बार और बात – बात में टूट जाते हो l”

दिल (थोड़ा गंभीरता से) – ” तुम तो रिश्तों और भावनाओं में भी तोल-मोल, जोड़ – घटाव करते हो l

तभी दोनों की नज़र वहाँ बैठी आत्मा (soul) पर पड़ती है l जो शांति से मुस्कुराते हुए दोनों की बातें सुन रही थी l

दिल (उत्सुकतावश) -” आपको कुछ नहीं बोलना? आप इतनी शांत कैसे हैं l”

आत्मा – “मेरी तो प्रकृति ही शांत है l तुम दोनों अगर आपसी द्वंद को भूलकर थोड़ा मौन होकर मेरी सुनो तो सदा साथ और सहभागी बनकर रहोगे l तुमदोनों दो पहियों की तरह हो साथ रहोगे तो कोई खुशी कोई मंज़िल दूर नहीं l”

दोनों प्यार से एक दूसरे को गले लगाते हैं l अपनी गलती स्वीकारते हैं कि, आपसी शोर में हम आपकी आवाज़ सुन ही नहीं पाते l

दोनों साथ में उस अजर, अमर, परमानंद स्वरूपिनी आत्मा को सादर नमन करते हैं l

नारी

द्वापर युग मे अपमानित हुई विदुषी द्रौपदी ,
बुद्धिजीवीयो के दरबार में।
आज भी आती है जाने कितनी द्रौपदी
साईबर के बाजार में।

क्यूं एक मां,इक बेटी, एक पत्नी, एक बहन, एक सखी,
ना होकर कभी बनकर रह जाती हो एक शरीर माश्र।

अभिमानी रावण दिखाया धीरज,
मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने ले ली अग्निपरीक्षा।
क्युं आज भी जलती है नारी, कभी दहेज की बेदी पर,
कभी गृह कलेश में तो कभी किसी के अहम् के तेजाब में।।

तुम तब भी पूज्यनीय सीता थी,
तुम अब भी पावन गंगा हो।
तुम तब भी सुंदर थी,
तुम अब भी सुंदर हो।

स्वरस्वती भी तुम, सिंधु भी तुम,
लक्ष्मी भी तुम, लक्ष्मी बाई भी तुम।

जीवन में आगे बढ़ते रहना,
सपनों की सीढ़ी चढ़ते रहना।
जगमग-जगमग सफलता के तारों से,
खुद को यूं ही सजाते रहना।

अंधेरों से ना डरना, ना घबराना कभी,
क्यूंकि ज्योति भी तुम और ज्वाला भी तुम।।

दादा – दादी, नाना – नानी

दादा – दादी, नाना – नानी की कहानी कभी भी ना होगी पुरानी दोस्तों।
Google और youtube पर दादी माँ के नुस्खे और नानी की कहानी सर्च करना छोड़,
कभी उनके साथ थोड़ा समय तो बिताकर देखो दोस्तों।

गोद में सिर रखकर उनके हाथों की नरमी से माथे की सिलवटें और सिकन को मिटाकर तो देखो दोस्तों।

झुर्रियों से लिपटी उनकी छोटी छोटी पनियाली आँखों मे नज़रिया है बड़ा जीवन को जीने का,

मार्गदर्शक हैं वो हर मुकाम हर मोड़ पर, क्योंकि जिया है उम्र के हर पड़ाव को और समझा है रिश्तों की सभी पहलुओं को।

माँ की डांट और पापा के गुस्से से बचने के लिए कभी जिनके पीछे छिप जाते थे तुम,
आज उन्ही से छिपकर दबे पांव ना घर से निकलना तुम दोस्तों।

रोज – रोज की भाग दौड़ को थोड़ा थामकर थोड़ा सा रुककर साथ में थोड़ा समय तो बिताओ दोस्तों।

नहीं चाहिए तुमसे उन्हें वो सुंदर सी शॉल, वो चश्मा, वो भगवान की सुंदर मूर्ति,
चाहिए तो बस मुट्ठी भर समय और थोड़ा सा साथ तुम्हारा।

कौन जाने शायद कल को ना बातें रहे, ना किस्से – कहानी, ना सवालों की बौछार, ना खट – खट करती छड़ी की आवाज।

रह जाए तो बस वो छड़ी, वो कुर्सी, वो पंबट्टा, वो चश्मा,वो नीले फीते वाली हवाई चप्पल, वो टीन का छोटा सा बक्सा, वो चाभीयों के गुच्छे से बँधा रुमाल जिसके दूसरे सिरे पर बंधे हैं कुछ रूपए चंद सिक्के।

चंद लम्हों को उनके साथ भी सी लो दोस्तों,
कहीं सिमट ना जाए उनकी मुस्कान
एक तस्वीर बनकर महज एक तस्वीर में।।

कुछ यादो,कुछ बातों

कुछ यादो के जुगनु, कुछ बातों की तितली
चुराया है हमने इन लम्हों से,
मुट्ठी के सरकते रेत से चुपके से छिपाई है कुछ सीपीयॉ ।
कुछ रुठना मनाना , थोड़ा शिकवा सताना
कुछ भींगे -भींगे नैना, थोड़े जागे -जागे रैना
कुछ बेफिक्री की शामें, थोड़ी जल्दीबाजी की सुबहें
सब क़ुछ समेट लिया है हमने अपनी झोली में,
और बाँध ली दो मजबूत गाँठे, कि कहीं उड़ ना जाए कहीं,
ये यादों के जुगनु और ये बातों की तितली ।।

ऐ वक्त

ऐ वक्त कभी तो रुक जा तु,
चलता रहता है बिना थके,बिना रूके
कभी तो सुस्ता ले, थोड़ा सा अलसाले
आ बैठ ना कभी बातें करते हैं
कुछ अपनी कहते हैं, कुछ तेरी सुनते हैं
लौट कर वापस कभी पीछे भी तो चल
दिखा दे फिर से हमें,
वो डगमग-डगमग सी चाल,
वो खरगोशी हँसी,
अक्षरों को जोड़-जोड़कर शब्दें बनाना,
पीछे-पीछे मेरे सारा दिन यूँ हीँ चलते रहना ।
पर पता है हमें बड़ा जिद्दी सा है तु
तु मानेगा नहीं, थमेगा नहीं।
तो चल हम हीं हो लेते हैं तेरे संग,
निचोड़ कर जी लेते हैं हर एक पल को,
कि फिर कभी भी मिन्नते ना करे तुझसे
चल वापस फिर से पीछे लौट चलते हैं।।

ऐ मेरी जिंदगी

मेरा आईना मेरी परछाई तु हमेशा से थी मुझमें हीं
और ढूँढती रही मैं मृगमारीचका सी चहूं ओर तुझे,
ऐ मेरी जिंदगी

कभी लगी बचपन से भोली
तो कभी पत्थर दिल निर्मोही
तु ऐ जिंदगी

कभी शराफ़त से शरीफ
तो कभी नटखट बदमाश लगे तु
ऐ जिंदगी

कभी सच से भी खरी
तो कभी झूठ से भी बनावटी
तु ऐ ज़िन्दगी

कभी आंखो से नमकिन पानी बन छलकती तु
तो कभी होठो पर मुस्कान सजाती तु

लेकिन अपनी हर एक अदा मे, हर रंग हर रूप मे,
उतनी ही प्यारी लगी मुझे
मेरी ऐ ज़िंदगी

ख़ुदा की खुदाई और किस्मत की लिखाई पर
होनेलगा खुद की सोच से ज्यादा यकीन,
तुझसे मिलकर ऐ मेरी ज़िन्दगी ll

पिया रे

तू सूर्य मैं सूर्यमुखी पिया रे,
संग-संग तेरे डोलूँ,
जित तू जाए उत मै जाऊ,
तुझसे तो बिन डोर बँधी मैं।

तू सूर्य मैं सूर्यमुखी पिया रे,
तू सबकुछ है मैं कुछ भी नहीं,
तू रौशनी का दरिया,
और मैं खुशबू भी नहीं।

तू सूर्य मैं सूर्यमुखी पिया रे,
बड़ी हीं खरी अनोखी
अपनी ये साझेदारी,
मीलों की दूरी और नैनो की साझेदारी।

तू सूर्य मैं सूर्यमुखी पिया रे,
तुझसे हीँ हूं मैं
बिन तेरे अस्तित्व नहीं,
नाम तुझसे शुरु, पहचान तुझपे खत्म।

तू सूर्य मै सूर्यमुखी पिया रे,
संग-संग तेरे डोलूँ ।।